Tuesday, 26 November 2019

राजस्थानी लोक साहित री सौरम

राजस्थानी लोक साहित री सौरम
 
लोक साहित में धन सूं घणी महिमा साहित 
अर जस री मानी। इण सारू दोहा- सोरठा अर 
केबतां लोक प्रचलित रही।
 
कोट डिगे, देवळ ढहे, वृख ईंधन व्है जाय।
जस रा आखर जै लिख्या, जातां जुगा न जाय।।           
अर्थात
दुनिया में बने किले और गढ़ ढह जाते हैं, 
उनकी सुरक्षा के लिए बने विशाल परकोटे
 गिर जाते हैं। बड़े-बड़े मंदिर भी समय
 बीत जाने पर धराशायी हो जाते हैं,
 पेड़ पौधे भी समय के साथ इंधन बनकर
 नष्ट हो जाते हैं लेकिन यश और प्रसिद्धी के
 लिखे गए अक्षर युगों युगों तक नहीं मिटते
 हैं वे अमर रहते हैं। इसी के अनुरूप एक
 स्थान पर लिखा गया है।
 
नाम रहंदा ठाकरां, नाणा नही रहंत ।
कीरत हंदा कोटड़ा, पाड्या नहीं पड़ंत ।।
अर्थात
दुनिया में व्यक्ति का नाम अमर रहता है।
 धन संपत्ति रुपए पैसे स्थाई नही 
कर्म से कमाया हुई कीर्ति के रूप में नाम 
अमर रहता है।यश कीर्ति के भवन गिराने 
से भी नही गिरते हैं।

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