Monday, 5 August 2019

रंग राजस्थानी

लोक साहित्य

नर तौ भूखा नेह रा, तर निरोग धर तेज।
उण थळवट सूं हे अली, हरदम कीजै हेज।।
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कवि अर्थावे क हे सहेली म्हारा उण मरु प्रदेस सूं हेत राखजे जठा रा मिनख नेह अर हेत राखणिया है,जठा री धरती तेजस्वी रही है।
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हे सखी ! उस मरुप्रदेश से सदैव स्नेह रखना जहां का मानव समाज स्नेह का अभिलाषी , वृक्ष रोग-रहित  और धरती तेजस्विनी है।

_सवाई सिंह चारण

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