Saturday, 25 May 2019

राजस्थानी सौरम में आज बांचो लोककथा


सेठां ने याद रहगी कथा री बात
 
एक सेठ न तो मिन्दर जावंतो अर न ही कोई ने हाथ सूं दान पुन करतौ। सेठां रै तो एक ही काम कमाओ दाम ही दाम। गांव में केई वार कथा प्रवचन हुवंता अर सेठाणी कहवंती ही क कदेई तो भगवान ने याद करौ अर कथा प्रवचन सुणन सारू जाओ दिनूंगे नीं जाओ तो सिंज्या ने कीरतन मांय जाय अर काया रौ भलो करौ। पण सेठ किण री सुणै उणां ने आप रा धंधा सूं ही फुरसत कोनी। गांव में किसी ही भागवता कथा हुवै चाहे कीरतन हुवै सेठां रै तो अंग ही कोनी लागै अर कदेई ही कथा सुणन कोनी जावंता हा। एक दिन सेठ गांव में गयौड़ा हा। जोग री बात ही क कोई काम सूं मिन्दर रै पाखती गळी सूं जावै हा क मिन्दर में कथा करता पंडतजी री आवाज सुण’र सेठ सोची क अठै तो कोई साधु संत प्रवचन करै हुवैला। सेठ झट देण सूं दोनूंं आंगळयां कान में घाल ली अर सोची क कोई प्रवचन सुणन में नहीं आ जावै। सेठां रै कान में आंगळियां घाले हा जिते ही इत्ती सी बात  ही कानां में सुणीजगी के न तो कोई भूत प्रेत हुवै अर न ही उणां री कोई छीयां हुवैै अर अंधारा मांय लोग आप री छींयां सूं ही भेम मांय ही डर जावै। भूत प्रेत जद हुवै ही कोनी जणां जमीन माथै उणां री छींया अर परछाई कियां पड़ै। सेठ चुपचाप ही गळी मांय सूं निकळग्यौ। थोड़ा दिनां पछै ही एक दिन सेठ आपरे घर में सूता हा। आधी रात नै एक चोर काळा कपड़ा पहरयां सेठां रे घर में घुसग्यौ। सेठ पेली तो काळी छींयां ने देख’र डरग्यौ अर काळा कपडा़ पैरयोड़ा ने भूत समझतो अर थर-थर धूजण लागगो। काळा कपड़ा पैरयो ड़ो आदमी ओपरो हुवै ज्यूं हो अर उणां री हरकतां इयांनकी ही क लोग बिनै भेम में भूत समझ लेवै। सेठ  थोड़ी ताल तांई तो समझयो ही कोनी अर गतागम में पजग्यौ। पछै सेठ डरयो कोनी अर उणां नै याद आयगी क पंडत रै कथा री बात क भूत पलीत कीं हुवै ही कोनी। अर भूत पलीत कीं हुवै ही कोनी जद उणां री छीयां कठा सूं आयगी। इण आदमी री तो छीयां पड़ती अर हिलती डुलती दिखै। आ बात याद आवंता ही बो सोची क ओ तो कोई ओपरो आदमी है जको म्हने भूत बण’र डरावणी चावै। हुवै न हुवै ओ तो कोई ओपरो आदमी भूत बण अर चाळो करै। ओ तो कोई चोर है जको काळा कपड़ा पेहरयां म्हने डरावंतो माल मतो ले जावण री नीत सूं आयौ है। आ समझ में आवंता ही सेठां ने जोस आयग्यौ अर जोर सूं धकाल करी क कोई आओ रै घर मांय चोर बड़ग्यौ। सेठां री धकाल सुणंता ही आखती पाखती रहवण वाळा लोग दौड़ अर आया अर चोर तो पोल खुलण र बात समझतां ही तेतीसा मनाया। चोर रा पग तो काचा ही हुवै जको बो तो नासतो ही दिस्यो। सेठ समझग्या क ओ तो सांचकली को चोर ही निकळयौ। सेठ सोची क भागता भूत री लंगोट ही चौखी। अर सेठ पाखती पडय़ा पाव रौ बाट हाथ में लेयर चोर रे मोरां में दे नाखी। सेठ की चाणचक बाट री चोर रै मोरंा में लागतां ही बोबाड़ मारतो बोल्यौ ओय मां ए मरग्यौ आज तो। इत्ता में गांव वाळाा भेळा हुयग्या अर चोर रौ लारो लेय लियौ। सेठ सोची कथा री एक बात ही म्हारी आंख्यां में चानणो कर दियौ जणां संगत मांय भेळा बैठ अर सुणन रा तो किता ही फायदा बडेरा बताया।

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