Thursday, 6 September 2018

राजस्थानी ओखाणां

लांठा रौ डोको डांग फाड़ै
पोतो दादी सूं मसखरी करतौ बोल्यो क दादी मां पेलां थें दादा ने पसन्द कर सगाई वास्तै हां करी क दादा थांने पसन्द करया। लाजां मरती दादी बोली आजकाल रा छोरां ने सरम ही कोनी आवै, अर ‘साळयां ने छोड़ अर सासुवां’ सूं मसखरी करता छाना कोनी रहवै। दादी पोता री बातां रै बिचाळे ही हंसता दादाजी बोल्या तूं हाल ही पचास साल पेलां  री सोच राखे आजकालै तो मोबाइल हाथ मांय लियां ही टाबर जलमंतां ही नरसां ने कहवै एक सेल्फी तो थांरै सागै बणै ही है मैडमजी। जको तूं सरम मत कर टाबर थारी म्हने छिप-छिप अर देखण री पुराणी बातां सुण घणा राजी हुवैला।
दादो पोता ने समझावतो बोल्यो क साख समंध करणे वास्ते बडेरां री कैबत आज भी साम्प्रत साव साची हुवंती दिखै, क ‘पाणी पीजै छाण अर सगपण कीजै जाण।’आधी अधूरी जाणकारी में अणदेख्यै में पड़णै रो घणों डर रेवै। बडेरा घर-बार देख अर सोच बिचार पूछताछ करता अर आगो पीछो सोचता पछै कोई बात नै आगै बढ़ावंता। ‘चट मंगनी पट ब्याव’वाळी उंतावळ आजकाल रा टाबर कर लेवै अर पछै फोड़ा पावै। बडेरा इयांनकी उंतावळ करता कोनी ‘आगली पाछली सगळी सोचता’। बडेरां री मानता ही क ‘हड़बड़ी कर काम ने बिगाड़णों’ हुवै। कठैई काम सधतो नीं दीखे तो सेंसकार संजोग में विसवास कर अर संतोष धार लेवंता। बे इण बात नै मानता हा क ‘सीर, सगाई अर चाकरी राजीपै रो काम’ हुवै। घर बर री खोज में कठैई अपरोखी जग्यां में पग पड़ ज्यावै। कठैई ‘बड़ाई रा डूंगर अर धन कोनी देख्यो जावै’,‘लियोड़ो दियोड़ो नीं कमायोड़ो ही काम अर आडो आवै’। कैबत में केवै ‘घर हीण दीजै बरहीण मत दीजै।’ क्यूं क बर में कीं ‘कणूका हुसी तो घर रो ऊपरलो पानो आंवतो देरी कोनी करै’। कमाई तो आपरी करेड़ी हुवै- दीयोड़ो किताक दिन चालै, ‘ऊलींचेड़ा तो कुवा ही निवड़ ज्यावै’।
दादो पोता रै सागै आपरी घर-धिराणी ने समझावंतो बोल्यो क आजकालै ‘समै बदळग्यौ’। पुराणी बातां रौ चलण खत्म हुयग्यौ। अब लाज सरम कोनी। घरवाळां री पूछ कोनी। ‘मियां बीबी राजी तो कांई करैला काजी’। जमानो बदळग्यो। अब ‘पुराणी लीक पीटणों बेकार’ है। फेसबुक माथै ‘बायोडाटा’ देख आपसरी में ‘कुण्डली नीं दिल मिलावै’ अर घर-घराणों नीं छोरा-छोरी ‘हॉबी’ मिलावै अर ‘ ’एक दूजा रा हुय जावै‘ ’। छोरा-छोरी रो डील डोळ, घर-परवार, लखण-सेंसकार, भणाई लिखाई अर घर रा रुतबा रा ‘चेप्टर कदेई क्लोज’ हुयग्या।
दादी बोली हां  लागै है क आपां जमानै सूं मोकळा लारै हां। मतोमती सै काम हुवण लाग्यां पछै टाबर माईतां रै कन्ने सूं तो हां भरवा अर ‘अंगूठो लगावण रौ काम ही राखै’। पुराणी बातां आजकाल रा टाबर कोनी देखै। अब तो घणकराक ब्याव-सावा टेवा मिलावण छोड़ अर ‘मन मिलावण री बातां करै’। अब तो पुराणी केबतां ही कोनी रही बदळगी, पेलां कहता हा ‘बडां घरां बेटी दी, मिलणै रा सांसा’ वाळी कैबत बण ज्यावै।
पोतो बोल्यो दादा थांरै कन्ने राजस्थानी रै ग्यान रौ तो खजाणों भरयो पडय़ौ है पण राज ही राजस्थानी ने मानता नीं देवै अर रोजगार सूं नीं जोड़े जणां घरां मांय ओ खजाणों माटी मांय दब्योड़ो पडय़ौ रहवै। आपां रै अठै राजस्थानी री भणांई करया एमए पास टाबर मास्टर री नौकरी वास्तै तरसे अर उरदू अर सिंधी रा कम पढय़ा लिख्या लोग बिना ‘कट ऑफ मार्कस’ सूं ही नौकरी पावै। राज री मरजादा नीं रही जणां नौकरयां मंाय मन पड़ै जका बारला परदेसां रा गोधा चरै अर अठा रौ गौवंस ग्यान हुवंतो ही मोटा डील डोल वाळो सांड भूखा मरै। दादा हाल तांई ही राजस्थानी लोग कोनी चेत्या अठे तो म्हारे घर रै मांय ही बार ला लोग आवै अर राज री कुरसियां माथै बैठा लोगां री सह मिलणै सूं ‘लांठा रो डोको थंारी डांग ने फाडै़’।

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