Friday, 31 August 2018

ईसरा-परमेसरा

रंग_राजस्थानी हरि-रस
 
मिळै उर रांम किधौ गुह मीत,पखाळ कुटंब किधौ सु प्रवीत।
विरूप किधी सुपणेखाय वन्न, तदी खरदूख वछोङिय तन्न ।।38।।
 
कवि अर्थावे ...
            हे प्रभु ! वनवास के समय आपने जो कार्य किये वे बङे विचित्र है-- गंगा पार करते समय गुह निषादराज  को अपना मित्र बनाकर हृदय से लगाया । निषादराज ने आपके चरणोदक का पान कर अपने कुटुम्ब को पवित्र किया ।  आपने सुपनखा राक्षसी के नाक-कान काट कर उसे कुरूप कर दिया । इस कारण खर और दूषण आप पर चढ आये जिनको भी आपने मार दिया ।
--प्रस्तुति सवाईसिंह महिया

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