Friday, 3 August 2018

बातां रह जाणी

'नाळौ बेवै खळळ खळळ'
मुगल काल मांय राजस्थानी भासा ने राजा महाराजा घणा चाहवन्ता हा। इण सारू मोकळा किस्सा बांचण ने मिल जावै। राजस्थानी बोलणो अर लिखणो घणो सोरो हुवे पण जिकी बोलण री लकब राजस्थानी ने जलम जात मिले दूजो नई बोल सके।
महाराजा गंगा सिंह जी री बखत रौ किस्सौ घणो प्रसिद्ध हुयो। गंगा सिंह जी आपरै दरबार मांय राजस्थानी लिख-बोल लेवण आळा ने ई सावळ पूछताछ कर नौकरी राखता। बां रै कनै एक'र एक जणो अरजी दिवी। मोती जियांनका आखरां मांय लिख्योड़ी अरजी बांच अर लिखत देखर घणां राजी हुया। बे बीं मिनख ने बुलायौ अर पूछ्यौ कठै रो रेवणियौ है मोट्यार ? 'आपरी ही प्रजा हूँ हुकुम।' महाराज ने ब़ैम होयौ जणा,पूछ्यो अरजी कुण लिखी थारी लिख्योडी है कांई। वो बोल्यो हां सा। बींनै कैह्यौ जणा तूं बोल- 'नाळौ बेवै खळळ खळळ' । वो बोल्यो- 'नालो बेवे खलल खलल।' इयां बोलतांई गंगासिंह जी अर्जी फाड़ फेंक दी। कहयो कूड़ बोले।

No comments:

Post a comment