Saturday, 25 August 2018

राजस्थानी कहाणी..

.बाबाजी इस्यो कांई लगायो चस्को क आवण लाग्या चेला...
जीयो बाबा जीयो आप ही घोटो अर पीयौ

एक गांव री बगीची मांय एक साधु महात्मा रहवंता हा। महात्मा दिन भर भजन कीर्तन करता हा। बाबाजी रो नांव कांई हो गांव रा लोगां ने आ तो ठा कोनी ही पण सगळा उणां ने जीयो बाबा ही कहता हा। जीयो बाबा गंाव में कद आया अर इण बगीची सूं पेलां कठे रहता आ नूंवा टाबरां ने तो कांई बूढ़ा बडेरां ने ही याद कोनी। जीयो बाबा ही तबीयत रा घणा मस्त हा। आपरी मस्त मौला आदतां सूं गांव रा लोगां वास्तै घणा हेताळु हुयग्या। तपस्या करण वास्तै बैठयां पछे दिन भर ही कोनी उठता। अर हथाई में लागता तो जाणै उणां रै कोई काम ही कोनी। गांव रा लोगां सूं हथाई ही करता रहता। हथाई में इता मगन हुवंता क वां ने दूजी कोई बात ही याद कोनी रहवंती। गांव रा बूढ़ा बडेरां कन्ने बैठयां बाबा रै कन्ने ग्यान री बातां हुवंती तो नूंवां छोरां सूं तो नूंवां जमाना री बातां करता क आजकाल रा टाबर देखता ही रह जावंता, क बाबा ने इती बातां उकळे कठा सूं है। बाबा री सगळी बातां चौखी ही अखरती तो एक ही बात क दोपारां पछै बाबा आपरी घुमटी मांय जाय अर सोय जावंता जको पाछा रात ढळता ही जागता। लोगां ने ठा ही क जीयो बाबा ने दोपारां भांग पीवण री लत ही। भांग रो नसो इस्यो क बिना संगी साथियां रै आणंद नीं आवै। बाबा करै तो करै कांई गांव में भांग रौ तो कोई काम ही नीं हो। भांग तो शहरी लोगां रौ नसो। गांव मांय तो अमल अर डोडा चालता। ज्यूं अमल डोडा लेवणियां रै बिना नसा रै काम नीं चालै आं यां ही कोनी खुलै बियां ही बाबा तो दोपारां तांई ही भजन भाव मांय लाग्योड़ा रहवंता हा, पछे आप री घोटी बूटी अर जमाई ठण्डाई अर पीय अर सोय जावंता। पण बाबाजी री ठण्डाई एकला मांय उगती कोनी। बूढ़ा बडेरा तो अमल रा नसा मांय ही चूंच रहवंता अर नूंवा जमाना रा छोरां वास्तै भांग मूंडे लाग्योड़ी कोनी। केई दिनां री कोसिस पछै बाबाजी रा भंगेड़ी संगी साथी त्यार नीं हुया जणां बाबाजी चेला त्यार करण री सोची। रोजीना बाबाजी एकला ही भांग घोटता अर पींवता। इणमें माथा फोड़ी घणी अर रहवंता एकला रा एकला। संगी साथी हुवै तो उडीक लेवे। पण कोई हुवै तो आवै। आखिर में बाबाजी तरकीब सोची अर भांग री जगां दोपारां ठण्डाई रै नांव सूं दूध रै सागै बिदाम अर पिस्ता घोटण लागगा। रोजीना पीळी राच केसर घाल रड़ायोड़ो दूध मांयने तिरता काजू बदाम अर पिस्तां रा स्वाद सूं गांव रा केई जणां रै मूंडा में लाळ पड़ण लागगी। अबै बाबाजी खिल्को करियौ र घोटयोड़ा दूध में थोड़ी भांग मिलावण लागगा। केई दिनां चिमटी-चिमटी भांग न्हाकता बाबाजी दूध में भांग रो मोटो डळो घोटण लागगा। धीरै-धीरै बाबाजी री मेहणत रंग ल्यायी अर केई भंगेडय़ां री लांठी टीम त्यार हुयगी। अबै दोपारां हुवै अर भंगेडय़ां री कडय़ां टूटण लाग ज्यावै। च्यार पांचेक भंगेड़ी दोपार हुंता ही बाबाजी रै अठे पूगण लागगा। पांच सात दिनां तांई  तो बाबाजी वांनै दूध अर भांग देय देंवता अर भांग घुटावंता। अर बाबाजी ने पतियारो हुयग्यौ क अबै तो चेला त्यार हुयग्या। एक दिन बाबाजी भरी दोपारी में खूंटी ताण सोय गया। बारै आया चेलां री नसां टूटण लागगी अर सोची क आज जियौ बाबा कियां चुपचाप पडय़ा है। भरी दोपारी रा तावड़ा में भांग पीवण रा सौकिन पूग्या अर दे ये क बाबाजी रै अठे तो आडो ढकयोड़ो है अर भांग री कीं त्यारी कोनी। घणी ताल उडीकयां पछै हेला पाडय़ा पण बाबाजी आडो कोनी खोल्यौ। सेवट खटखट री आवाज सुणर बाबाजी बोल्या कुण है भाई। चेला बोल्या आडो खोलो ओ जीयो बाबो, आडो खोलो। बाबाजी बोल्या हां बेटा बारै पड़ी है सिलाड़ी अबै खुद ही घोटो अर खुद ही पीयौ।

3 comments:

  1. कहाणी पढ़र जी सोरो हुग्यो

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  2. जियो बाबो री कहानी सुन मज़ो आ गयो

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  3. मजो आयग्यो सा

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