Friday, 3 August 2018

ईसरा-परमेसरा

रंग_राजस्थानी हरि-रस
मिळै उर रांम किधौ गुह मीत, पखाळ कुटंब किधौ सु प्रवीत।
विरूप किधी सुपणेखाय वन्न,तदी खरदूख वछोङिय तन्न।।38।।

कवि अर्थावे
हे प्रभु ! वनवास के समय आपने जो कार्य किये वे बङे विचित्र है-- गंगा पार करते समय गुह निषादराज को अपना मित्र बनाकर हृदय से लगाया । निषादराज ने आपके चरणोदक का पान कर अपने कुटुम्ब को पवित्र किया। आपने सुपनखा राक्षसी के नाक-कान काट कर उसे कुरूप कर दिया । इस कारण खर और दूषण आप पर चढ आये जिनको भी आपने मार दिया ।
_प्रस्तुति सवाई सिंह महिया

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