Monday, 9 July 2018

ईसरा-परमेसरा

रंग_राजस्थानी हरि-रस
किधौ रव घोर महेस कोदंड,ब्रवै तिरलोक डर्या बळबंड।
आयौ रिख कोप चवंत अँगार,तज्यौ बळ चाप हुओ दुज त्यार।।36।।
कवि अर्थावे 
     आपने जब भगवान शंकर का महा कठोर धनुष तोङा , उससे जो घोर शब्द हुआ जिससे तीनों लोक चकित हो गये और बङे-बङे शक्तिशाली भयभीत हो गये । महर्षि परसुराम क्रोधाग्नि बरसाते हुए वहां आये किन्तु आपके ब्रह्मस्वरूप का परिचय पाकर शान्त हो गये और अपनी अदृश्य माया शक्ति को आपकी अनिर्वचनीय ब्रह्म-शक्ति में प्रविष्ट कर अपने ब्राह्मण रूप में शेष हो गये एवं अपना धनुष आपको अर्पण कर दिया ।
  _सवाई सिंह महिया

No comments:

Post a comment