Friday, 6 July 2018

ईसरा-परमेसरा

रंग_राजस्थानी हरि -रस

सुबाहु मरीच ताङीका सँघार, महारिख कीध निसंक मुरार।
जनक्क तणै बळि आविय जाग,भुतेस धनूस भँग्यो वड भाग।।35।।

कवि अर्थावे आपने ही सुबाहु राक्षस और ताङिका राक्षसी को मार और मारीच को भगाकर हे राम ! विश्वामित्र ऋषि को आपने निर्भय कर दिया । वहाँ के राजा जनक के यज्ञ में आकर हे महाभाग ! आपने शिवजी के धनुष को तोङा ।

    ---प्रस्तुति सवाई सिंह महिया


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