Saturday, 26 May 2018

रंग राजस्थानी

हरि-रस   ईसरा-परमेसरा

किता तैं वार लिधा क्रिसन्न, रिणायर रोळ'र चउद रतन्न।
मथ्यौ तैं वार किता महरांण, सुरां लई अम्रित दीध सुजांण।।26।।

      हे कृष्ण ! आपने कितनी ही बार समुद्र का मंथन करके उसमें से चौदह रत्नों को निकाला और कितनी ही बार देवताओं को अमर बनाने के लिए समुद्र मन्थन द्वारा प्राप्त 【चौदह रत्नों में से】 अमृत को उन्हें पान करा दिया ।
--प्रस्तुति सवाई सिंह महिया

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