Sunday, 15 October 2017

लोक कथा

मूंजी सेठ रै सपना रौ दुख
एक गांव में मूंजी सेठ रहवंता हा। सेठां ने रात दिन रिपिया-पइसा री बात ही सूझती। दिन हुवै चाहे रात,सुबह हुवै शाम उणां ने गहणां-गांठां अर सोना चांदी री बातां ही ध्यान में रहवंती। अठा तांई दिन हुवै चाहे रात हर टेम सेठ धन माया रा ही सपना देखता। सेठ रात्यूं ही सूती टेम नींद में ही सोना चांदी रा सपना देखतो ही बड़बड़ करतौ रहवंतो। उणां ने सपना में भी सोना चांदी अर जेवर रा भाखर दिखता। एक दिन सिंज्या पडय़ां ही सेठ सोय गयौ। आधी रात ने सपना में सोना चांदी रा पहाड़ देख‘र वो जाणै नींद में ही चालण लागगौ। अर आधी नींद अर आधी जाग में ही चुपचाप घर में सूं गेंती फावड़ो लेय’र व्हीर हुयौ। उणां ने तो सपना में सोना चांदी रा भाखर ही दिखै हा। अर लालच इत्तो क कोई घर रौ देख नीं लेवै इण वास्तै सावचेती सूं घर वाळां सूं छाने-लुकतो छिपतो सांचाणी नींद में ही आपरे घर रा ओरा सूं बारे आयौ। सेठ होळे सीक घर रौ आडो खोल्यो अर सिरी मोड़ा सूं बारै निकळयौ।  आप री ही धुन में चुपचाप चालतौ व्हो हाका धड़बा सूं डरतो आगे बधग्यौ। व्हो जाब्ता सूं आडो खोलयौ अर नूंवी लुगाई री जियां होळे-होळे पग मेलतो आगे बधग्यौ। घर रौ आडो खोल्यो अर पगतियां माथै सूं नीचै उतरण लाग्यौ। नींद में चालतो-चालतो ही बो ऊंची चांतरी सूं नीचे उतरै हो क पग ताचकग्यो। अर आधी नींद में तो हो ही सीधो ही नीचे पड़तां ही अर जोर सूं धमीड़ उठयौ। सियाळा री आधी रात ने कुण सुणै अर आडो खोले। हेटे पड़तां  ही उणां रौ हाथ रेत में नीचे दब्यौ। सेठां रै लीलाड़ माथै भचीड़ लाग्यौ। जोधपुरी भाटा लाग्यौड़ी चांतरी री सिलाड़ी रा खुणां री लागतां ही सेठां रै माथौ लोही सूं भरीजग्यौ। सेठ डील सूं भारी हुवण सूं एक हाथ नीचे दबग्यो। कीं तो बुढापौ अर ऊपर सूं भारी सरीर नीचे पड़तां दब्योड़ा रा हाथ रो हाडको टूट गयौ। सियाळा री ठंडी रात में सेठां रो हाको सुणन वाळो भी कोई कोनी हो। सेवट घर में जाग हुई अर घरवाळा दौड़‘र बारनै आया। पांच सात जणां सेठां ने ऊंचाया अर घर रै मांयनै लेय गया। थोड़ी देर में ही सगळा घर रा लोग भेळा हुयग्या। सेठां री तो बोलती बंद। घरवाळा तो हाल चाल पूछता, कांई हुयौ, कांई हुयौ। सेठां रै पाटा-पूळी कराया पछै घरवाळा धीमे सीक पूछया क कांई हुयौ। अर घरवाळा रै सागै आड़ोसी-पाड़ौसी पूछण लाग्या क थां क्यांन पडय़ा। थांरै कांई हुयौ। लोगां रै घणा पूछण लाग्यां पछै सेठ थोड़ी देर वास्तै चुप हुय गया। सेठ आधी रात में क्यांन पडय़ा अर घर रै बारे कियांन गया आ कोई सोच ही कोनी सक्यौ। सेठ सपना री बात तो लोगां ने बतावै कोनी अर एक ही जवाब देवंता रहयौ क सपनो आधो साचो अर आधो झूठो हुयग्यो। घरवाळा पूछया क किसो सपनो साचो अर किसो झूठो हुयौ। आ सुण‘र सेठ बोल्या क  भाखर माथे सूं सोना-चादी लेवण वास्ते जावै हो क़ चुंतरी माथै सुं नीचे पडय़ो अर लीलाड़ रै लागी ओ आधो सपनो तो साचो हुयौ पण सोना चांदी रा पहाड़ तांही पूग नीं सक्यौ ओ आधो सपनो झूठो हुयग्यो। सेठ टसकतो जावै अर आवे जावै जका ने ही सगळो किस्सो बतांवतो जावै क जै चुंतरी माथै सूं नीचे नहीं पड़तो तो थोड़ी देर में ही सोना चांदी रा भाकर कन्ने पूग जांवतो अर घर में सोना चांदी रा ढिगला लगाय देवंतौ। म्हारे तो सात कांई चवदाह पीढ़ी तांई रो सुख हुय जांवतो। लोग सेठां री बात सुण‘र मुळकता अर मूण्डा सांमी देख अर सोचण लागता क गांव में धाप‘र कमाई करतां थकां ही बुढ़ापा में सेठ रो जीव कोनी भरीज्यो। अर  हाल तांई सपना में सोना चांदी रा पहाड़ देखै अर भटका आवे।

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