Friday, 1 September 2017

केबत

आगम सूझे सांडणी दौड़े थलां अपार।
पग पटके बेसे नहीं जद मेह आवणहार।।
बडेरा रां री केबत है कि सांडणी ने मेह हुवण री आगम सूझे, सांडणी जद अताल-पताल कूदे अर बेसे नहीं तो सम झणो चाहिजै के अब मेह आवेला।

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